ارسال شده: جمعه ۲۹ اردیبهشت ۱۳۸۵, ۷:۰۲ ب.ظ
قاسم بيك حالتي :
از راهِ عشق، خوف و خطر هيچ كم نشد
با آنكه كاروان ز پي كاروان گذشت
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بيدل :
از فريب خاكساريهاي خصم ايمن مباش
سنگ تا شد مايل افتادگي، مينا شكست
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منصور اصفهاني :
از قامتِ خميدهي من مگذر اي جوان
تير آن زمان بخاك فتد، كز كمان گذشت
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بيدل :
از قبول عام، نتوان زيست مغرور كمال
آنچه تحسين ديدهاي زين خلق، دشنام است و بس
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عبرت نائيني :
از ما مپرس كز چه دل از دست دادهايم
از آنكه برده است دل از دست ما، بپرس
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مولانا جلال الدين :
از محبت، خارها گل ميشود
وز محبت، سركهها مُل ميشود
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سنجان خوافي :
از مرگ مينديش و غمِ رزق مخور
كاين هر دو، به وقتِ خويش ناچار رسد
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احسان :
از مكافات عمل هيچكس ايمن نبود
هر كه را شحنه رها كرد، خدا ميگيرد
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خواجه شعيب :
از هر چه غير اوست، چرا نگذري؟
كافر براي خاطرِ بت، از خدا گذشت
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صائب تبريزي :
از هستي ِ دوباره به تنگاند عارفان
تو سادهلوح، طالبِ عمر دوبارهاي
از راهِ عشق، خوف و خطر هيچ كم نشد
با آنكه كاروان ز پي كاروان گذشت
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بيدل :
از فريب خاكساريهاي خصم ايمن مباش
سنگ تا شد مايل افتادگي، مينا شكست
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منصور اصفهاني :
از قامتِ خميدهي من مگذر اي جوان
تير آن زمان بخاك فتد، كز كمان گذشت
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بيدل :
از قبول عام، نتوان زيست مغرور كمال
آنچه تحسين ديدهاي زين خلق، دشنام است و بس
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عبرت نائيني :
از ما مپرس كز چه دل از دست دادهايم
از آنكه برده است دل از دست ما، بپرس
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مولانا جلال الدين :
از محبت، خارها گل ميشود
وز محبت، سركهها مُل ميشود
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سنجان خوافي :
از مرگ مينديش و غمِ رزق مخور
كاين هر دو، به وقتِ خويش ناچار رسد
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احسان :
از مكافات عمل هيچكس ايمن نبود
هر كه را شحنه رها كرد، خدا ميگيرد
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خواجه شعيب :
از هر چه غير اوست، چرا نگذري؟
كافر براي خاطرِ بت، از خدا گذشت
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صائب تبريزي :
از هستي ِ دوباره به تنگاند عارفان
تو سادهلوح، طالبِ عمر دوبارهاي





