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ارسال شده: پنج‌شنبه ۴ خرداد ۱۳۸۵, ۲:۲۲ ب.ظ
توسط susan
حس غریبی دارم
حس تنهایی ِ غریبی
مثل آنروزها که نبودی
حس کسی که ماه ها تمام ِ کوچه های بی چراغ ِ منتهی به تو را دوید
و کسی از او نپرسید
که در سرش چه می گذرد
چه رسد به دلش!
خسته ام فرشته ی من
در تمام این سه ماه ِ متفاوت ِ گذشته
به اندازه ی دویدن های این سه روز خسته نبوده ام
مانده ام با یک خانه پر از بوی تو ...
نگاهم به هر طرف که می رود تو را می بیند ...
جای خالی ات خیلی آزارم می دهد ...
آزرده می شوم و دلتنگ ...
دلتنگ تو ... دلتنگ حرفهایت ... دلتنگ آغوش گرمت ...دلتنگ بوسیدنت حتی ...
آزرده ام از دیدن روزهای تلخ بی تو بودن و آزرده که می شوم به همه می پرم
تو نیستی و جای تو را هیچ خدایی پر نمی کند ...
این روزها
پی ِ هر شبی که می گذرد ، روزی از عمرم کم می شود
تمام نیرویم را با خود می برد

و من تمام می شوم و تُهی
در آخر
تنها تو در این فضای تهی، ته نشین می شوی
و زمزمه ای در سرم مرور می شود:
" ...باز با من تا آخر دنیا می مانی ؟؟ "
می دانم تنها مسبب دوري از تو و این احساس خلاء و تنهایی مرگ آور ، خودم بوده ام !!
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در پي يك گل سرخ،مي روم روبه خدا

مي روم تا كهكشان.

زير باران بهار

يك نفر داد به دستم گل سرخي زيبا

من زدم لبخندي

-قيمتش سي گل مريم باشد.

و لبخندم خشكيد و دلم شد تشنه.

در پي يك گل سرخ

مي روم بالاتر

آنجا كه يك نفر هست كه گلي دارد در دست

من به او گفتم:گل سرخت زيباست.

گفت:قيمتش صد گل شب بو باشد.

-من ندارم هيچ.

باز هم مي دوم در پي يك گل سرخ،

مي زوم بالاتر

باغباني آنجاست.

مي دوم تا باغش

مي روم من سويش:

گل سرخت چند است؟

-قيمتش يك لبخند،تو چه مي پردازي؟

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ارسال شده: جمعه ۵ خرداد ۱۳۸۵, ۱۱:۵۴ ق.ظ
توسط ARMIN
بيدل :

اي خوش آن عهدي كه در محراب چشم انتظار
اشك ما هم گردشي چون سبحه زهاد داشت


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سيف الدين باخرزي :

اي سوخته‌ي سوخته‌ي، سوختني
عشق آمدني بُود، نه آموختني


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بيدل :

اي نفس مايه! دكانداري هستي تا چند
آسمان جنس سلامت به تو نفروخته است


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بيدل :

اي نهال گلشن عبرت به رعنايي مناز
شمع، پستي مي‌كشد چندان كه قامت مي‌كشد


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لساني شيرازي :

اي همنفسان آتشم، از من بگريزيد
هر كس كه بُوَد دوست من، دشمنِ خويش است


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شيخ فيضي :

اي همنفسان محفل ِ ما
رفتيد، ولي نه از دل ِ ما


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ملاي رومي :

اي هميشه حاجتِ ما را پناه
بار ديگر، ما غلط كرديم راه


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بيدل :

ايمن نتوان بود ز همواري ظالم
در راستي، افزوني زخم است سنان را


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صائب تبريزي :

اين تخم توبه‌اي كه تو در خاك كرده‌اي
موقوفِ آبياريِ اشكِ ندامت است


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ابوسعيد ابوالخير :

اين عالَم بي‌وفا كه من مي‌بينم
نه ناز تو، نه نيازِ من مي‌ماند


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بيدل :

اين قدر اشك به ديدار كه حيران گل كرد
كه هزار آينه‌ام بر سر مژگان گل كرد


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مهديقلي هدايت :

اينكه شمعِ تو، نمي‌گيرد فروغ
از دروغ‌ست از دروغ‌ست از دروغ


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صائب تبريزي :

اينكه گاهي ميزدم بر آب و آتش خويش را
روشني در كارِ مردم بود، مقصودم چو شمع


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سيمين بهبهاني :

اينكه هر سو مي‌كشم با خود، نپنداري تن‌ست
گورِ گردان‌ست و، در او آرزوهاي من‌ست

ارسال شده: جمعه ۵ خرداد ۱۳۸۵, ۱۰:۲۰ ب.ظ
توسط ARMIN
بيدل :

با چنين دردي كه بايد زيست دور از دوستان
به كه نپسندد قضا بر هيچ دشمن زندگي


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بيدل :

با درشتان، ظالمان هم بر حساب عبرتند
سنگ اگر مرد، است جاي شيشه سندان بشكند


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نجيب شيرازي :

با دوستيت، دوستيِ غير محال است
بي‌كسْ شود آن كس كه ترا داشته باشد


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غني كشميري :

با سايه تو را نمي‌پسندم
عشق‌ست و هزار، بدگماني


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بيدل :

با شمع گفتم: از چه سرت مي‌دهي به باد؟
گفت: آن سري كه سجده ندارد چنين خوش است


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عبدالقادر بيدل :

با هر كمال، اندكي آشفتگي خوش‌ست
هرچند عقلِ كُل شده‌‌اي، بي‌جنون مباش


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بيدل :

با همه نوميدي، اقبال سيه‌بختان رساست
چون شب عصيان، ز مشتاقان صبح رحمتيم


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بيدل :

باطن اين خلق كافر كيش با ظاهر مسنج
جمله قرآن در كنارند و صنم در آستين


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بيدل :

بايد از اقتضاي شوق بر سر غفلتم گريست
از تو جدا چسان شوم؟ تا طلبم وصال تو

ارسال شده: شنبه ۶ خرداد ۱۳۸۵, ۲:۱۰ ب.ظ
توسط susan
حالمان بد نیست غم کم می خوریم


کم که نه هر روز کم کم می خوریم

آب می خواهم سرابم میدهند

عشق می ورزم عذابم میدهند

خود نمیدانم کجا رفتم به خواب

از چه بیدارم نکردی آفتاب

خنجری بر قلب بیمارم زدند

بی گناهی بودم و دارم زدند
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تمام غم ها و دلواپسی هایتان را

به قلب من بسپارید ،

خالی شوید از هرچه بدی است .

با کسی قرارداد بسته ام تا ....

همه آن ها را به جهنم ببرد .

آری ، با شیطان هم میشود معامله کرد .

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ما بدهكاريم


به كساني كه صميمانه ز ما پرسيدند


معذرت مي خواهم چندم مرداد است ؟


و نگفتيم


چون كه مرداد


گور عشق گل خونرنگ دل ما بوده است ...
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ارسال شده: شنبه ۶ خرداد ۱۳۸۵, ۹:۰۷ ب.ظ
توسط ARMIN
غروري شيرازي :

بايد كه، تو برنگردي از من
برگشتنِ روزگار، سهل‌ست


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بيدل :

بر بناي دهر از سيل قيامت نگذرد
آنچه از روي عرقناك تو بر دلها گذشت


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خاقاني شرواني :

بر ديده من خندي؟ كاينجا ز چه مي‌گِريد
خندند بر آن ديده، كاينجا نشود گريان


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بيدل :

بر رفيقان بيدل از مقصد چه سان آرم خبر؟
من كه خود را نيز تا آن جا رسم، گم مي‌كنم


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باقر تبريزي :

بر زمين نتوان فكندن هر كه را برداشت عشق
صورت منصور را، بردار مي‌بايد كشيد


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بيدل :

بر صفاي دل زاهد اين قدر چه مي‌نازي؟
هر چه آينه گرديد باب خودفروشان شد


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بيدل :

بر صفحه آتش زده عمر منازيد
فرصت چقدر سبحه شمار است ببينيد


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عماد خراساني :

بر ما گذشت نيك و بد، اما تو روزگار
فكري به حال خويش كن، اين روزگار نيست


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ناشناس :

بر مال و جمال خويشتن، غره مباش
كآن را به شبي برند و، اين را به تبي


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بيدل :

بر ندارد ننگ افسردن دل آزادگان
شعله بيتاب ما را آرميدن مردن است


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بيدل :

بر نيايد تا ابد از حيرت شكر نگاه
هر كه، چون تصوير، بر نقاش چشمي وا كند


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ناشناس :

بر نيايد، اين دو كار از هيچ فرد
مردي از نامرد و، نامردي ز مرد


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بيدل :

برق آفت لمعه در بي ضبطي اسرار داشت
نعره منصور تا گردن فرازد دار داشت


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بيدل :

بزم از دل گداخته لبريز مي‌شود
مينا اگر نكنند ز سنگ مزار ما

ارسال شده: دوشنبه ۸ خرداد ۱۳۸۵, ۳:۴۷ ب.ظ
توسط ARMIN
بيدل :

بس كه در ميزان هستي سنگ قدرم بيش بود
در عدم با كوه مي‌سنجند اعمال مرا


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بيدل :

بس كه مردم دامن احسان زهم واچيده‌اند
بيدل از خست كسي را سايه ديوار نيست


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بيدل :

بسته‌ام چشم از خود و سير دو عالم مي‌كنم
اين چه پرواز است؟ يا رب! در پر نگشوده‌ام


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اشرف :

بسكه حرف حق كسي در دهر نتواند شنيد
گيرد اول در اذان گفتن، مؤذن گوش را


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بيدل :

بسمل ما بس كه از ذوق شهادت مي‌تپد
تيغ قاتل مي‌شمارد فرصت تكبير را


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دقيقي مروزي :

بعد مردن به تو معلوم شود رنج حيات
رهرو آن لحظه بنالد، كه بمنزل برسد


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بيدل :

بگذار تا ز خاك سيه سرمه‌اش كشند
چشمي كه محو صنعت بيچون نمي‌شود


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علي اطهري كرماني :

بگذار تا، به بينمش اكنون كه مي‌رود
اي اشك از چه راهِ تماشا گرفته‌اي؟


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بيدل :

به آستان تو عهد غبار من اين است
كه گر سپهر شوم، جز به خاك ننشينم


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بيدل :

به اين توفان ندانم در تمناي كه مي‌گريم
كه سيل اشك من در قعر دريا راند ساحل را


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بيدل :

به اين سستي كه مي‌بينم ز بخت نارسا بيدل
كشد نقاش هم مشكل به دامان تو دست من

ارسال شده: دوشنبه ۸ خرداد ۱۳۸۵, ۸:۳۴ ب.ظ
توسط susan
اگرمی دانستم به واسطه سرقت محبت مرا در دادگاه چشمانت

محکوم خواهی کرد و خود به قضاوت خواهی نشست و مرابه

جرم مهربانی و صداقت از همه چیز محروم خواهی کرد و به

پشت میله های زندان تنهایی خواهی افکند هرگز چشم به روی

پنجره چشمانت که همیشه غمگین است نمی گشودم


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شب را دوست دارم !

چون ديگر رهگذري از کوچه پس کوچه هاي شهرم نمي گذرد تا سر گرداني مرا ببيند .چون انتها را نمي بينم .تا براي رسيدن به آن اشتياقي نداشته باشم.

شب را دوست دارم .

چون ديگر هيچ عابري از دور اشک هاي يخ زده ام را در گوشه ي چشمان بي فروغم نمي بيند.

شب را دوست دارم : چرا که اولين بار تو را در شب يافتم .

از شب مي ترسم : تو را در شب از دست دادم.

از شب متنفرم ، به اندازه ي تمام عشق هاي دروغين.

با آفتاب قهرم ، چرا شبها به ديدارم نمي آيد؟

نمي آيد تا با دست هنرمندش سايه ي تو را بر ديوار خيالم نقش زند و مرا به بودنت دلخوش سازد.

شايد آفتاب با من قهر است؟؟

آ ن روز که تو در کنارم بودي ، هرگز به آ فتاب سلام نکردم ، هر کز به روي شب لبخند نزدم. و برايش دستي تکان ندادم.

اين مجازات تمام لحظه هاييست که همه ي دنيا را در تو ديدم و تو را در تمام دنيا
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رسمه که لحظه ی خداحافظی یادگاری بهم می دن

قشنگترین هدیه ی تو تو قلب منه

یه مشت غمه

شاید اینو بهم دادی که همیشه یادم بمونه

حق با تو

تو راست می گی

غمت همیشه پیشمه !

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در سكوت مي توان نگاه را معنا كرد

و آن را با عشق به دل پيوند زد

مي توان بهار را به ديدار برگهاي خزان زده برد

و براي رازقي هاي اميد از عطر دوست داشتن گفت

مي خواهم سكوت كنم و تنها به حرف نگاهت گوش كنم.

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ارسال شده: دوشنبه ۸ خرداد ۱۳۸۵, ۱۱:۴۳ ب.ظ
توسط ARMIN
ناشناس :

به تمول نرسد، هر كه نشد اهل فساد
تا كه دندان نخورد كِرم، مطلاّ نشود


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سراج الدين قمري :

به جامه فخر مكن، بر برهنگيمْ مخند
كه سهم بيش بُوَد، تيغهاي عريان را


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بيدل :

به جهد، مسند عزت نمي‌شود حاصل
نمي‌توان به فلك بيدل از دويدن رفت


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بيدل :

به چشم عبرت اگر بنگري نخواهي ديد
ز جامه جز كفن، از خانه‌ها بغير قبور


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بيدل :

به حرف و صوت اين محفل ندارم نسبتي بيدل
خموشي كرده‌ام روشن، چراغ كنج ادراكم


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طالب آملي :

به حشر تنْ به جحيم افكنمْ نخستين گام
دل و دماغِ رسَنْ بازيِ صراطم نيست


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سعدي :

به حلاوت بخورم زهر، كه شاهد ساقي‌‌ست
به ارادت ببرم درد، كه درمان هم از اوست


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ملا محمد باقر مجلسي :

به خوابِ عدم، راحتي داشتيم
ازين خوابِ، ما را كه بيدار كرد؟


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بيدل :

به خيال چشم كه مي‌زند قدح جنون دل تنگ ما؟
كه هزار ميكده مي‌دود به ركاب گردش رنگ ما


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بيدل :

به دل شكسته از اين چمن زده‌ايم بال گذشتني
كه شتاب اگر همه خون شود، نرسد به گرد درنگ ما


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بيدل :

به دير و كعبه كارت چيست بيدل؟
اگر فهميده‌اي دل خانه كيست

ارسال شده: سه‌شنبه ۹ خرداد ۱۳۸۵, ۱۲:۲۳ ب.ظ
توسط saeed284
چه کسی گفت سرو آزاد است
با ریشه هائی که خاک را چنگ میزنند
چه کسی گفت سپیدار ستواراست
باسری خمیده برمسیرهرنسیم
بلندبالای من نه سرو باش نه سپیدار
افتابگردان
برمدار نو میگردد.

ارسال شده: سه‌شنبه ۹ خرداد ۱۳۸۵, ۲:۳۲ ب.ظ
توسط ARMIN
سلام
saeed284, ورودت را به اين سايت خوش آمد مي گويم. بسيار زيبا نوشتي.اميدوارم شاهد فعاليت بيشترت در اين بخش باشم.

ارسال شده: چهارشنبه ۱۰ خرداد ۱۳۸۵, ۱۱:۲۹ ب.ظ
توسط ARMIN
محمد علي بهمني :

به شب نشيني خرچنگهاي مُردابي
چگونه رقص كند، ماهي زلال پرست؟


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بيدل :

به عالمي كه زند موج شعله مجمر دل
ز چشمك شرري بيش نيست آتش طور


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دكتر رعدي آذرخشي :

به عشق كوش، كه تا در دل ِتو ره نكند
نه ماجراي وجودي، نه وحشت عدمي


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فرج الله شبستري :

به غير سينه‌ي دريادلان، نگنجد عشق
براي بحر، خدا آفريده طوفان را


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شاني تكلو :

به فصل لاله و گُل، خواستم كه مي‌نوشم
ز جام تا بقدح ريختم، بهار گذشت


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بيدل :

به قدر نفي ما آماده است اثبات يكتايي
كتان چندان كه تارش بگسلد در ماهتاب افتد


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بيدل :

به گردون گر رسم، از سجده شوقت نيم غافل
چو ماه نوجبيني خفته در محراب ابرويم


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عارف گيلاني :

به نوبه هم نشود دورِ آسمانْ به مُرادم
در آسياي فلك، يك جو اعتبار ندارم


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بيدل :

به هر افسردگي از تهمت بيدردي آزادم
چو تار ساز در هر جا كه باشم ناله بر دوشم

ارسال شده: پنج‌شنبه ۱۱ خرداد ۱۳۸۵, ۲:۵۶ ب.ظ
توسط susan
به چه مانند کنم ؟



به چه مانند کنم موي پريشان تو را؟

به دل تيره شب ؟

به يکي هاله دود ؟

يا به يک ابر سياه -

که پريشان شده وريخته بر چهره ماه ؟

به نوازشگر جان ؟ -

يا به لطفي که نهد گرم نوازي در سيم ؟ -

يا بدان شعله شمعي که بلرزد ز نسيم ؟



به چه مانند کنم حالت چشمان تو را ؟

به يکي نغمه جادويي از پنجه ي گرم ؟ -

به يکي اختر رخشنده بدامان سپهر ؟

يا به الماس سياهي که بنوشندش در جام شراب ؟

به غزل هاي نوازشگر حافظ در شب ؟ -

يا به سرمستي طغيانگر دوران شباب ؟



به چه مانند کنم سرخي لب هاي تو را ؟

به يکي لاله شاداب که بنشسته به کوه ؟ -

به شرابي که نمايان بود از جام بلور ؟

به صفاي گل سرخي که بخندد در باغ ؟ -

به شقايق که بود جلوه گر بزم چمن ؟ -

يا به ياقوت درخشاني در نور چراغ ؟



مرمر صاف تنت را به چه مانند کنم ؟

به بلوري رخشان ؟ -

يا به پاکي و دل انگيزي برف ؟

به يکي ابر سپيد ؟ -

يا به مخمل خوشرنگ نوازشگر گرم ؟

به يکي چشمه ي نور؟ -

يا به سيماي گل انداخته از دولت شرم؟

به پرندي که کند جلوه گري در مهتاب ؟ -

به گل ياس که پاشيده بر آن پرتو ماه ؟ -

يا به قويي که رود نرم و سبک در دل آب ؟


به چه مانند کنم خلوت آغوش تورا ؟

به يکي بستر گل ؟ -

به پرستشگه عشق ؟ -

يا به خلوتگه جانها که غم از ياد برد ؟

به نفس هاي بهار ؟ -

يا به يک خرمن ياس -

که شميم خوش آن را همه جا باد برد ؟



به چه مانند کنم ؟

من ندانم

به نگاهي تو بگو -

به چه مانند کنم... ؟!