قاسم بيك حالتي :
از راهِ عشق، خوف و خطر هيچ كم نشد
با آنكه كاروان ز پي كاروان گذشت
--------------------------------------------------------------------------------
بيدل :
از فريب خاكساريهاي خصم ايمن مباش
سنگ تا شد مايل افتادگي، مينا شكست
--------------------------------------------------------------------------------
منصور اصفهاني :
از قامتِ خميدهي من مگذر اي جوان
تير آن زمان بخاك فتد، كز كمان گذشت
--------------------------------------------------------------------------------
بيدل :
از قبول عام، نتوان زيست مغرور كمال
آنچه تحسين ديدهاي زين خلق، دشنام است و بس
--------------------------------------------------------------------------------
عبرت نائيني :
از ما مپرس كز چه دل از دست دادهايم
از آنكه برده است دل از دست ما، بپرس
--------------------------------------------------------------------------------
مولانا جلال الدين :
از محبت، خارها گل ميشود
وز محبت، سركهها مُل ميشود
--------------------------------------------------------------------------------
سنجان خوافي :
از مرگ مينديش و غمِ رزق مخور
كاين هر دو، به وقتِ خويش ناچار رسد
--------------------------------------------------------------------------------
احسان :
از مكافات عمل هيچكس ايمن نبود
هر كه را شحنه رها كرد، خدا ميگيرد
--------------------------------------------------------------------------------
خواجه شعيب :
از هر چه غير اوست، چرا نگذري؟
كافر براي خاطرِ بت، از خدا گذشت
--------------------------------------------------------------------------------
صائب تبريزي :
از هستي ِ دوباره به تنگاند عارفان
تو سادهلوح، طالبِ عمر دوبارهاي
جملات و شعر هاي زيبا
مدیر انجمن: شوراي نظارت
سهراب :
گفتی چشمها را باید شست !
شستم
ولی.....
گفتی جور دیگر باید دید!
دیدم
ولی.....
گفتی زبر باران باید رفت
رفتم
ولی او نه چشم های خیس و شسته ام را
نه نگاه دیگرم را هیچکدام را ندید
فقط در زیر باران با طعنه ای خندید
و گفت : دیوانه باران زده !
-------------------------------------------------------
دلم طاقت نشستن ندارد
...
دلم طاقت نشستن ندارد وقتی به چشمهایم می نگری
چشمهایم تحمل نگریستن ندارد وقتی مرا می نوازی
روحم پر می کشد وقتی با من سخن می گویی
زبانم هم که بند می آید
تو بگو چه کنم با این همه التهاب که همه از دوست داشتن توست
غزل هایم را فراموش می کنم
از سهراب یا نیما، فروغ یا شهریار چیزی به یاد نمی آورم
فقط باید زمزمه کنم
زیر لب به گونه ای که تو نیز بشنوی
کسی درون من است که از دریچه چشمم به کوچه می نگرد
کسی درون من است...
-----------------------------------------------------------
چو خورشید بی دریغ باش در سخاوت
چو آسمان در یکرنگی
درخت سایه اش را به کسی نفروخت
باران از کسی آب بها نگرفت
آنوقت ما آدم ها
بعضی وقتها
حتی لبخندمان را از هم دریغ می کنیم
بدان
آنانکه آفتاب را به زندگی دیگران ارزانی می دازند
نمی توانند خود ازآن بی بهره باشند
---------------------------------------------------------
گفتی چشمها را باید شست !
شستم
ولی.....
گفتی جور دیگر باید دید!
دیدم
ولی.....
گفتی زبر باران باید رفت
رفتم
ولی او نه چشم های خیس و شسته ام را
نه نگاه دیگرم را هیچکدام را ندید
فقط در زیر باران با طعنه ای خندید
و گفت : دیوانه باران زده !
-------------------------------------------------------
دلم طاقت نشستن ندارد
...
دلم طاقت نشستن ندارد وقتی به چشمهایم می نگری
چشمهایم تحمل نگریستن ندارد وقتی مرا می نوازی
روحم پر می کشد وقتی با من سخن می گویی
زبانم هم که بند می آید
تو بگو چه کنم با این همه التهاب که همه از دوست داشتن توست
غزل هایم را فراموش می کنم
از سهراب یا نیما، فروغ یا شهریار چیزی به یاد نمی آورم
فقط باید زمزمه کنم
زیر لب به گونه ای که تو نیز بشنوی
کسی درون من است که از دریچه چشمم به کوچه می نگرد
کسی درون من است...
-----------------------------------------------------------
چو خورشید بی دریغ باش در سخاوت
چو آسمان در یکرنگی
درخت سایه اش را به کسی نفروخت
باران از کسی آب بها نگرفت
آنوقت ما آدم ها
بعضی وقتها
حتی لبخندمان را از هم دریغ می کنیم
بدان
آنانکه آفتاب را به زندگی دیگران ارزانی می دازند
نمی توانند خود ازآن بی بهره باشند
---------------------------------------------------------
چه مهمانان بي دردسري هستند مُردگان! نه به دستي ظرفي را چرک مي کنند نه به حرفي دلي را آلوده تنها به شمعي قانعند و اندکي سکوت

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- تاریخ عضویت: شنبه ۶ اسفند ۱۳۸۴, ۹:۳۰ ب.ظ
- محل اقامت: تهران. شهرک اکباتان
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مخبرالسلطنهي هدايت :
از واعظِ غيرمتعظ، پند شنيدن
چون قبلهنما ساختنِ اهلِ فرنگ است
--------------------------------------------------------------------------------
وصفي بخارايي :
از سبكروحي دل، تا خبري يافتهام
زندگي بارِ گرانيست كه بر دوشِ منست
--------------------------------------------------------------------------------
طالب آملي :
افروختن و، سوختن و، جامهدريدن
پروانه ز من، شمع ز من، گُل ز من آموخت
--------------------------------------------------------------------------------
سليم تهراني :
اگر به ميكده منصور بگذرد، داند
كه هر كه هست در او، چند مَرده حلاجست
--------------------------------------------------------------------------------
حكيم ابوالقاسم فردوسي :
اگر چرخ گردون كشد زينِ تو
سرانجام خشتست، بالين ِ تو
--------------------------------------------------------------------------------
راقم مشهدي :
اگر چه فرش من از بورياست، طعنه مزن
چرا كه؟ خوابگه شير در نيستانست
--------------------------------------------------------------------------------
سعدي :
اگر عنقا، ز بيبرگي بميرد
شكار از چنگِ گنجشكان نگيرد
--------------------------------------------------------------------------------
سعدي :
اگر لذتِ تركِ لذت بداني
دگر لذت نفس، لذت نخواني
--------------------------------------------------------------------------------
صائب تبريزي :
اگرچه از حيا دارد نظر بر پيش پاي خود
ولي مژگان شوخش از تهِ دلها خبر دارد
--------------------------------------------------------------------------------
فريدون گيلاني :
الماسهاي ديدهي من، مشتري نداشت
گوهر شناس بود، فقط آستين من
--------------------------------------------------------------------------------
صفي عليشاه :
الهي، قفلِ غفلت را كليدي
يزيدِ نفسِ ما را، بايزيدي
--------------------------------------------------------------------------------
بيدل :
امروز پي نام و نشان چند دويدن؟
فردا كه گذشتيد، نه آنيد نه اينيد
--------------------------------------------------------------------------------
حسنخان شاملو :
امشب به هيچوجه، دلم وا نميشود
گويا كه خاطرِ كسي از من گرفته است
--------------------------------------------------------------------------------
اسير رازي :
اميد وصل تو نگذاشت، تا دهم جان را
وگر نه روزِ فراق تو، مردن آسان بود
از واعظِ غيرمتعظ، پند شنيدن
چون قبلهنما ساختنِ اهلِ فرنگ است
--------------------------------------------------------------------------------
وصفي بخارايي :
از سبكروحي دل، تا خبري يافتهام
زندگي بارِ گرانيست كه بر دوشِ منست
--------------------------------------------------------------------------------
طالب آملي :
افروختن و، سوختن و، جامهدريدن
پروانه ز من، شمع ز من، گُل ز من آموخت
--------------------------------------------------------------------------------
سليم تهراني :
اگر به ميكده منصور بگذرد، داند
كه هر كه هست در او، چند مَرده حلاجست
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حكيم ابوالقاسم فردوسي :
اگر چرخ گردون كشد زينِ تو
سرانجام خشتست، بالين ِ تو
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راقم مشهدي :
اگر چه فرش من از بورياست، طعنه مزن
چرا كه؟ خوابگه شير در نيستانست
--------------------------------------------------------------------------------
سعدي :
اگر عنقا، ز بيبرگي بميرد
شكار از چنگِ گنجشكان نگيرد
--------------------------------------------------------------------------------
سعدي :
اگر لذتِ تركِ لذت بداني
دگر لذت نفس، لذت نخواني
--------------------------------------------------------------------------------
صائب تبريزي :
اگرچه از حيا دارد نظر بر پيش پاي خود
ولي مژگان شوخش از تهِ دلها خبر دارد
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فريدون گيلاني :
الماسهاي ديدهي من، مشتري نداشت
گوهر شناس بود، فقط آستين من
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صفي عليشاه :
الهي، قفلِ غفلت را كليدي
يزيدِ نفسِ ما را، بايزيدي
--------------------------------------------------------------------------------
بيدل :
امروز پي نام و نشان چند دويدن؟
فردا كه گذشتيد، نه آنيد نه اينيد
--------------------------------------------------------------------------------
حسنخان شاملو :
امشب به هيچوجه، دلم وا نميشود
گويا كه خاطرِ كسي از من گرفته است
--------------------------------------------------------------------------------
اسير رازي :
اميد وصل تو نگذاشت، تا دهم جان را
وگر نه روزِ فراق تو، مردن آسان بود
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- تماس:
خدا قول نداده آسمون هميشه آبی باشه و باغ ها پوشيده از گل
قول نداده زندگی هميشه به كامت باشه
خدا روزهای بی غصه و شادی های بدون غم و سلامت بدون درد رو هم قول نداده
خدا ساحل بی طوفان، آفتاب بی بارون و خنده های هميشگی رو قول نداده
خدا قول نداده که تو رنج و وسوسه و اندوه رو تجربه نكنی
خدا جاده های آسون و هموار، سفرهای بی معطلی رو قول نداده
قول نداده کوه ها بدون صخره باشن و شيب نداشته باشن
رود خونه ها گل آلود و عميق نباشن
قول داده ؟
ولی خدا رسيدن يه روز خوب رو قول داده
خدا روزی روزانه ، استراحت بعد از هركار سخت و کمک تو كارها و عشق جاودان رو قول داده . عجب روزی می شه اون روز
پس ناملايمات زندگی رو شکر بگو و فقط از خودش کمک بگير که اوجاودانه است و بس
نااميدی مثل جاده ای پر دست اندازه که از سرعت کم می کنه
اما همين دست انداز نويد يه جاده صاف و وسيع رو بهت می ده
زياد تو دست انداز نمون
وقتی حس کردی به اون چيزی كه می خواستی نرسيدی خدا رو شکر کن چون اون می خواد تو يه زمان مناسب ترا غافلگيرت کنه و يه چيزی فراتر از خواسته الانت بهت بده
يادت باشه تو نمی تونی كسی رو به زور عاشق خودت کنی
پس تنها كاری که می تونی بكنی اينه که شخصی دوست داشتنی باشی و در نظر مردم باارزش و شريف جلوه کنی
بهتر اينه که غرورت رو بخاطر عشقت فراموش کنی تا عشقت رو به خاطر غرورت
هيچ وقت يه دوست قديمی رو ترک نكن چرا که عمرا بتونی کسی رو پيدا کنی كه بتونه جای اونو بگيره
قول نداده زندگی هميشه به كامت باشه
خدا روزهای بی غصه و شادی های بدون غم و سلامت بدون درد رو هم قول نداده
خدا ساحل بی طوفان، آفتاب بی بارون و خنده های هميشگی رو قول نداده
خدا قول نداده که تو رنج و وسوسه و اندوه رو تجربه نكنی
خدا جاده های آسون و هموار، سفرهای بی معطلی رو قول نداده
قول نداده کوه ها بدون صخره باشن و شيب نداشته باشن
رود خونه ها گل آلود و عميق نباشن
قول داده ؟
ولی خدا رسيدن يه روز خوب رو قول داده
خدا روزی روزانه ، استراحت بعد از هركار سخت و کمک تو كارها و عشق جاودان رو قول داده . عجب روزی می شه اون روز
پس ناملايمات زندگی رو شکر بگو و فقط از خودش کمک بگير که اوجاودانه است و بس
نااميدی مثل جاده ای پر دست اندازه که از سرعت کم می کنه
اما همين دست انداز نويد يه جاده صاف و وسيع رو بهت می ده
زياد تو دست انداز نمون
وقتی حس کردی به اون چيزی كه می خواستی نرسيدی خدا رو شکر کن چون اون می خواد تو يه زمان مناسب ترا غافلگيرت کنه و يه چيزی فراتر از خواسته الانت بهت بده
يادت باشه تو نمی تونی كسی رو به زور عاشق خودت کنی
پس تنها كاری که می تونی بكنی اينه که شخصی دوست داشتنی باشی و در نظر مردم باارزش و شريف جلوه کنی
بهتر اينه که غرورت رو بخاطر عشقت فراموش کنی تا عشقت رو به خاطر غرورت
هيچ وقت يه دوست قديمی رو ترک نكن چرا که عمرا بتونی کسی رو پيدا کنی كه بتونه جای اونو بگيره
تا حالا به معني کلمه مادر دقت کردي

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بيدل :
انديشه سرنگون شد، سعي خرد جنون شد
دل هم تپيد و خون شد، تا فهم راز كردم
--------------------------------------------------------------------------------
ذوقي اردستاني :
انگشت مزن بر دلِ پر حوصلهي ما
بگذار كه سربسته بماند، گِلهي ما
--------------------------------------------------------------------------------
محمد علي صاعدي :
انگشت هم شود گِرهي كارِ تيرهبخت
روز بلا، بد از در و ديوار ميرسد
--------------------------------------------------------------------------------
بيدل :
اوج دولت سفله طبعان را دو روزي بيش نيست
خاك اگر امروز بر چرخ است، فردا زيرپاست
--------------------------------------------------------------------------------
بيدل :
اوج عزت نيست بيدل دلنشين همتم
پرتو خورشيدم، احرام تنزل بستهام
--------------------------------------------------------------------------------
ميرزا نوري :
اول از روزنهي خانه برون آر سري
آنقدر تاب ندارم كه دري باز كني
--------------------------------------------------------------------------------
عبدالرحمان جامي :
اول همه تو بودي و، آخر همه توئي
اين لافِ هستيِ دگران، در ميانه چيست؟
--------------------------------------------------------------------------------
آذر بيگدلي :
اولم خنده، ز بيدردي بود
آخرم، گريه ز بيدرماني
--------------------------------------------------------------------------------
فروغي بسطامي :
اولم رام نمودي به دل آراميها
آخرم سوختي از حسرتِ ناكاميها
--------------------------------------------------------------------------------
اقبال لاهوري :
اي برادر من ترا از زندگي دادم نشان
خواب را مرگِ سبك دادن، مرگ را خوابِ گران
--------------------------------------------------------------------------------
مولانا جلال الدين :
اي برادر، تو فقط انديشهاي
مابقي، تو استخوان و ريشهاي
--------------------------------------------------------------------------------
بيدل :
اي بي خبر ز صاف دلان احتراز چيست؟
زنگي است آن كه آينه روز سياه اوست
--------------------------------------------------------------------------------
بيدل :
اي خوش آن شوق كه از لذت بيعافيتي
كشتيم وحشت گرداب ز ساحل ميداشت
انديشه سرنگون شد، سعي خرد جنون شد
دل هم تپيد و خون شد، تا فهم راز كردم
--------------------------------------------------------------------------------
ذوقي اردستاني :
انگشت مزن بر دلِ پر حوصلهي ما
بگذار كه سربسته بماند، گِلهي ما
--------------------------------------------------------------------------------
محمد علي صاعدي :
انگشت هم شود گِرهي كارِ تيرهبخت
روز بلا، بد از در و ديوار ميرسد
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بيدل :
اوج دولت سفله طبعان را دو روزي بيش نيست
خاك اگر امروز بر چرخ است، فردا زيرپاست
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بيدل :
اوج عزت نيست بيدل دلنشين همتم
پرتو خورشيدم، احرام تنزل بستهام
--------------------------------------------------------------------------------
ميرزا نوري :
اول از روزنهي خانه برون آر سري
آنقدر تاب ندارم كه دري باز كني
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عبدالرحمان جامي :
اول همه تو بودي و، آخر همه توئي
اين لافِ هستيِ دگران، در ميانه چيست؟
--------------------------------------------------------------------------------
آذر بيگدلي :
اولم خنده، ز بيدردي بود
آخرم، گريه ز بيدرماني
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فروغي بسطامي :
اولم رام نمودي به دل آراميها
آخرم سوختي از حسرتِ ناكاميها
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اقبال لاهوري :
اي برادر من ترا از زندگي دادم نشان
خواب را مرگِ سبك دادن، مرگ را خوابِ گران
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مولانا جلال الدين :
اي برادر، تو فقط انديشهاي
مابقي، تو استخوان و ريشهاي
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بيدل :
اي بي خبر ز صاف دلان احتراز چيست؟
زنگي است آن كه آينه روز سياه اوست
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بيدل :
اي خوش آن شوق كه از لذت بيعافيتي
كشتيم وحشت گرداب ز ساحل ميداشت
Don't play games with the ones who love you
واما من از تنهایی آوازی ساخته ام با صدای سازی شکسته و کهنه.....
اقسوس که نخواهی شنید از دور دستها......
نخواهی شنید از پشت چشمهای بسته ات....
درگاه چاهی را که به وسعت گذشته ای سهمناک باز گشته است...
و من...در ابتدای سقوط در سکوتی دردناک بی انتظار نشسته ام....
-------------------------------------------------------------------------------------
و رفت تا لب هیچ.....
و پشت حوصله ی نورها دراز کشید
و هیچ فکر نکرد
که ما میان پریشانی تلفظ درها....
برای خوردن یک سیب....چقدر تنها ماندیم!
(سهراب)
--------------------------------------------------------------------------------------
شب از ارواح سکوت سرشار است...
ریشه ها از فریاد....
رقص ها از خستگی.....!
(شاملو)
--------------------------------------------------------------------------------------
تو کجایی؟
در گستره ی بی مرز این جهان تو کجایی؟
من در دوردست ترین جای جهان ایستاده ام :
کنار تو...!!!!
(شاملو)
---------------------------------------------------------------------------------------
جبران خلیل جبران:
اولین بوسه٬ نخستین گل بر سرشاخه ی درخت زندگی است.
---------------------------------------------------------------------------------------
کاش می شد
دل تنهایم را
نوک کوهی ببرم
یا به دری آویزم
یا برایش قبایی بخرم
همچون سنگ
تا که هر لحظه نگردد دلتنگ
تا که دائم نزند بر من چنگ
یا کند روز خدا را
با شبش در یکرنگ
کاش می شد،
اما .... گله ای نیست
لحظه هایم همه شیرین است
من قناعت دارم
و به این جنگ عادت ....
--------------------------------------------------------------------------------------------------
نامت چه بود؟
آدم
فرزند؟
من را نه مادری.نه پدر. بنویس اول یتیم عالم خلقت
محل تولد؟
بهشت پاک
اینک محل سکونت؟
زمین خاک
آن چیست برگرده نهادی؟
امانت است
قدت؟
روزی چنان بلند که همسایه خدا. اینک به قدر سایه بختم به روی خاک
اعضای خانواده؟
حوای خوب و پاک .قابیل خشمناک.هابیل زیر خاک
روز تولدت؟
در روز جمعه ای. به گمانم که روز عشق
رنگت؟
اینک فقط سیاه. ز شرم چنان گناه
چشمت؟
رنگی به رنگ بارش باران. که ببارد ز آسمان
وزنت؟
نه آنچنان سبک که پرم در هوای دوست. نه آن چنان وزین که نشینم بر این زمین
جنست؟
نیمی مرا ز خاک. نیم دیگر خدا
شغلت؟
در کار کشت امیدم. به روی خاک
شاکی تو؟
خدا
نام وکیل؟
آن هم فقط خدا
جرمت؟
یک سیب از درخت وسوسه
تنها همین؟
تنها همین
حکمت؟
تبعید در زمین
همدست در گناه؟
حوای آشنا
ترسیده ای؟
کمی
ز چه؟
که شوم من اسیر خاک
آیا کسی به ملاقتت آمده است؟
بلی
که؟
گاهی فقط خدا
داری گلایه ای؟
دیگر گلایه نه. ولی....
ولی که چه؟
حکمی چنین. آن هم به یک گناه؟!
دلتنگ گشته ای؟
زیاد
برای که؟
تنها فقط خدا
آورده ای سند؟
بلی
چه؟
دو قطره اشک
داری تو ضامنی؟
بلی
چه کس؟
تنها کسم خدا
در آخرین دفاع؟
میخوانمش. چنان که اجابت کند دعا

اقسوس که نخواهی شنید از دور دستها......
نخواهی شنید از پشت چشمهای بسته ات....
درگاه چاهی را که به وسعت گذشته ای سهمناک باز گشته است...
و من...در ابتدای سقوط در سکوتی دردناک بی انتظار نشسته ام....
-------------------------------------------------------------------------------------
و رفت تا لب هیچ.....
و پشت حوصله ی نورها دراز کشید
و هیچ فکر نکرد
که ما میان پریشانی تلفظ درها....
برای خوردن یک سیب....چقدر تنها ماندیم!
(سهراب)
--------------------------------------------------------------------------------------
شب از ارواح سکوت سرشار است...
ریشه ها از فریاد....
رقص ها از خستگی.....!
(شاملو)
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تو کجایی؟
در گستره ی بی مرز این جهان تو کجایی؟
من در دوردست ترین جای جهان ایستاده ام :
کنار تو...!!!!
(شاملو)
---------------------------------------------------------------------------------------
جبران خلیل جبران:
اولین بوسه٬ نخستین گل بر سرشاخه ی درخت زندگی است.
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کاش می شد
دل تنهایم را
نوک کوهی ببرم
یا به دری آویزم
یا برایش قبایی بخرم
همچون سنگ
تا که هر لحظه نگردد دلتنگ
تا که دائم نزند بر من چنگ
یا کند روز خدا را
با شبش در یکرنگ
کاش می شد،
اما .... گله ای نیست
لحظه هایم همه شیرین است
من قناعت دارم
و به این جنگ عادت ....
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نامت چه بود؟
آدم
فرزند؟
من را نه مادری.نه پدر. بنویس اول یتیم عالم خلقت
محل تولد؟
بهشت پاک
اینک محل سکونت؟
زمین خاک
آن چیست برگرده نهادی؟
امانت است
قدت؟
روزی چنان بلند که همسایه خدا. اینک به قدر سایه بختم به روی خاک
اعضای خانواده؟
حوای خوب و پاک .قابیل خشمناک.هابیل زیر خاک
روز تولدت؟
در روز جمعه ای. به گمانم که روز عشق
رنگت؟
اینک فقط سیاه. ز شرم چنان گناه
چشمت؟
رنگی به رنگ بارش باران. که ببارد ز آسمان
وزنت؟
نه آنچنان سبک که پرم در هوای دوست. نه آن چنان وزین که نشینم بر این زمین
جنست؟
نیمی مرا ز خاک. نیم دیگر خدا
شغلت؟
در کار کشت امیدم. به روی خاک
شاکی تو؟
خدا
نام وکیل؟
آن هم فقط خدا
جرمت؟
یک سیب از درخت وسوسه
تنها همین؟
تنها همین
حکمت؟
تبعید در زمین
همدست در گناه؟
حوای آشنا
ترسیده ای؟
کمی
ز چه؟
که شوم من اسیر خاک
آیا کسی به ملاقتت آمده است؟
بلی
که؟
گاهی فقط خدا
داری گلایه ای؟
دیگر گلایه نه. ولی....
ولی که چه؟
حکمی چنین. آن هم به یک گناه؟!
دلتنگ گشته ای؟
زیاد
برای که؟
تنها فقط خدا
آورده ای سند؟
بلی
چه؟
دو قطره اشک
داری تو ضامنی؟
بلی
چه کس؟
تنها کسم خدا
در آخرین دفاع؟
میخوانمش. چنان که اجابت کند دعا






